विजय जोसफ, जिन्हें उनके प्रशंसक ‘दलपति विजय’ के नाम से जानते हैं, ने अपनी हालि में फिल्म G.O.A.T. (Greatest Of All Time) के साथ एक बार फिर बड़े पर्दे पर धमाल मचाने का प्रयास किया है। लेकिन क्या यह फिल्म वाकई ‘ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम’ साबित हो पाई? आइए जानते हैं इस फिल्म की खासियतों और खामियों के बारे में। 

थकाने वाली लंबाई और कमजोर हिंदी डबिंग

फिल्म G.O.A.T. की सबसे बड़ी चुनौती है इसकी लंबाई। फिल्म का समय लगभग तीन घंटे का है, जिसमें इंटरवल के बाद फिल्म की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। हिंदी दर्शकों के लिए एक और बड़ी समस्या है फिल्म की हिंदी डबिंग। जहां तेलुगु सिनेमा ने हिंदी दर्शकों के साथ अपना मजबूत संबंध बना लिया है, वहीं तमिल सिनेमा की हिंदी में पकड़ अब भी कमजोर दिखाई देती है। G.O.A.T. की हिंदी डबिंग इसे और भी कमजोर बना देती है, जिससे हिंदी पट्टी के दर्शक इस फिल्म के साथ जुड़ नहीं पाते।


कहानी और विजय का डबल रोल



G.O.A.T. की कहानी कुछ हद तक सुनी-सुनाई सी लगती है। विजय का किरदार गांधी, जो एक रॉ एजेंट है, एक समय पर अपने शांत जीवन का आनंद ले रहा होता है, लेकिन उसके अतीत की कुछ घटनाएं उसे वापस एक्शन में खींच लाती हैं। फिल्म में विजय का डबल रोल है, लेकिन यह जादू दर्शकों पर कुछ खास असर नहीं छोड़ पाता। इंटरवल से पहले फिल्म तेजी से चलती है, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी खिंचती हुई सी लगने लगती है।


इंटरवल के बाद फिल्म की गिरावट



फिल्म का दूसरा हाफ मुख्य समस्या बनकर उभरता है। इंटरवल के बाद फिल्म का प्रवाह धीमा हो जाता है और पटकथा कमजोर दिखाई देने लगती है। अनावश्यक गाने और लंबे चेज सीक्वेंस फिल्म की लय को बार-बार तोड़ देते हैं। निर्देशक वेंकट प्रभु ने फिल्म को भव्य बनाने का प्रयास किया है, लेकिन इसके चलते कहानी का ध्यान कहीं खो जाता है। विदेशी लोकेशन्स को दिखाने की कोशिश में कहानी का असली मजा गायब हो जाता है।


निर्देशन और संगीत की कमजोर कड़ियां

G.O.A.T. में वेंकट प्रभु का निर्देशन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता। फिल्म की कहानी में मौलिकता की कमी साफ दिखाई देती है। डायलॉग्स में भी वह पैनापन नहीं है, जो इसे यादगार बना सके। खासतौर से, बाप-बेटे के बीच के संवादों में वह जान नहीं है, जो दर्शकों को बांध सके। संगीत भी फिल्म का कमजोर पक्ष है। युवान शंकर राजा का संगीत इस फिल्म की गति को सहारा नहीं दे पाता और गाने कहानी का प्रवाह बार-बार तोड़ते हैं।


विजय का प्रदर्शन और राजनीतिक दृष्टिकोण

तमिल सिनेमा में विजय जोसफ का बड़ा नाम है, और उनके प्रशंसक हमेशा उनकी तुलना रजनीकांत से करते रहे हैं। लेकिन G.O.A.T. जैसी फिल्में विजय के प्रशंसकों के लिए भी संतोषजनक साबित नहीं होती हैं। जहां विजय की युवा भूमिका दर्शकों को थोड़ा आकर्षित करती है, वहीं सीनियर एजेंट गांधी के किरदार में वे उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाते। तमिलनाडु की राजनीति में उतरने की तैयारी कर रहे विजय के लिए अब हर फिल्म उनके राजनीतिक करियर के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई है, लेकिन इस फिल्म ने उनकी इस नई छवि को भी दर्शकों तक सही से नहीं पहुंचाया।


निष्कर्ष: दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरी



फिल्म G.O.A.T. भले ही विजय के प्रशंसकों के लिए एक तोहफा हो, लेकिन हिंदी पट्टी में यह फिल्म कुछ खास प्रभाव छोड़ने में असफल रही है। लंबे समय तक खींची गई कहानी, कमजोर पटकथा और हिंदी डबिंग की समस्याओं ने इसे एक सामान्य फिल्म बना दिया है। यह फिल्म विजय के करियर के उस मुकाम पर आई है जब उनके हर कदम को राजनीतिक नजरिये से देखा जा रहा है, लेकिन G.O.A.T. न तो सिनेमा के लिहाज से और न ही उनकी छवि के लिहाज से कुछ नया

 कर पाई।